डॉ. सुशील कुमार फुल्ल के कथा-साहित्य में पर्वतीय पर्यावरण और पारिस्थितिक चेतनारू एक पर्यावरण-समीक्षात्मक अध्ययन
DOI:
https://doi.org/10.18848/msyh6y05Abstract
प्रस्तुत शोध-पत्र डॉ. सुशील कुमार फुल्ल के कथा-साहित्य में निहित पर्वतीय पर्यावरण और पारिस्थितिक चेतना का पर्यावरण-समीक्षात्मक दृष्टि से विश्लेषण करता है। अध्ययन का उद्देश्य यह समझना है कि किस प्रकार उनके कथा-संसार में पर्वतीय प्रकृति, स्थानीय जीवन और मानवीय मूल्यों के बीच सह-अस्तित्व का संबंध स्थापित होता है। शोध में गुणात्मक एवं वर्णनात्मक-विश्लेषणात्मक पद्धति अपनाई गई है तथा चयनित कथाओं का विश्लेषण पर्यावरण-समीक्षा के सैद्धांतिक ढाँचे के अंतर्गत किया गया है। अध्ययन से यह स्पष्ट होता है कि डॉ. फुल्ल के कथा-साहित्य में पर्वतीय पर्यावरण केवल पृष्ठभूमि न होकर कथा की अर्थवत्ता को गढ़ने वाला सक्रिय तत्व है। उनकी रचनाओं में पर्यावरणीय संकट, संसाधन-दोहन, विकासजन्य दबाव और पारंपरिक जीवन-पद्धतियों के विघटन को मानवीय अनुभवों के माध्यम से अभिव्यक्त किया गया है। साथ ही, उनकी कथाएँ प्रकृति-केंद्रित जीवन-दृष्टि और पारिस्थितिक संतुलन की आवश्यकता पर बल देती हैं। निष्कर्षतः यह शोध स्थापित करता है कि डॉ. सुशील कुमार फुल्ल का कथा-साहित्य समकालीन हिंदी साहित्य में पर्यावरणीय विमर्श को सशक्त करता है तथा मानव-प्रकृति संबंधों के पुनर्संतुलन की वैचारिक दिशा प्रदान करता है।





